ये लो जमीन घोटाले से सर्जित हुई रोशनी


-धनंजय कुमार


राजनेताओं की निगाहें जहाॅ जाती हैं वहाॅ पर कब्जे करने की बू आती है। सच, इतना भयंकर और कड़वा होगा कोई सोच भी नहीं सकता। आखिर वही हुआ जिसकी आशंका थी। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की आड़ लेकर तैयार किए गए कानूनों में घोटालों का खुलासा शुरू हो गया है। यह देश का सबसे बड़ा जमीन घोटाला बनकर सामने आ रहा है और इसकी राशि 25 हजार करोड़ रुपये से भी ऊपर जा रही है। इसमें खुद को कश्मीर का रहनुमा बताने वाले फारूक अब्दुल्ला ने भी बहती गंगा में हाथ धोए और वन भूमि खरीद कर जम्मू में अपना आलीशान बंगला बना लिया। दरअसल, जम्मू कश्मीर में आरक्षित, वन भूमि और सामान्य ज़मीन की खरीद फरोख्त को लेकर केंद्र की खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट में कई चौंका देने वाले खुलासे हुए थे। इस रिपोर्ट के कुछ पन्ने लीक हो गए थे, जिससे यह घोटाला जनता को पता चल गया। साल 2001 में, फारूक अब्दुल्ला की सरकार रोशनी एक्ट (जम्मू और कश्मीर राज्य भूमि एक्ट 2001) लेकर आई थी। इस कानून को लाने का मकसद भूमि पर अनाधिकृत कब्जे को नियमित करना बताया गया था, ताकि घूमंतु प्रजाति बकरवाल समुदाय को लाभ मिल सके। लेकिन इसकी आड़ लेकर जम्मू को भी कश्मीर की तरह मुस्लिम बहुल बनाना था। इस कानून ने कई दशकों से जम्मू-कश्मीर में सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने वालों को मालिकाना हक दे दिया गया। इसके लिए कट ऑफ वर्ष 1990 निर्धारित किया गया। बाद में जम्मू-कश्मीर में आने वाली सरकारें इसे बदलती रहीं।


इसको रोशनी एक्ट का नाम इसलिए दिया गया था कि इसके तहत जमीन आवंटन से प्राप्त होने वाली राशि को बिजली ढांचे को सुधारने में उपयोग किया जाना था। लेकिन रोशनी एक्ट की आड़ में वहां के तमाम मंत्रियों, दिग्गज नेताओं और अफसरों ने अपनी तिजोरियां रोशन कर लीं। जमीन का आंवटन सही तरीके से नहीं हुआ। इसके तहत लाखों हेक्टेयर सरकारी जमीन लोगों को औने-पौने दाम में बांट दी गई थी। केवल 15.58 फीसद जमीन को ही मालिकाना हक के लिए मंजूरी दी गई। पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने 28 नवंबर, 2018 को इस योजना को रद्द कर दिया। एक जनहित याचिका के बाद हाई कोर्ट ने भी इस एक्ट को असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया था। कोर्ट ने इसके तहत बांटी गई जमीनों का नामांतरण रद्द करने का आदेश दिया और लाभार्थियों के नाम सार्वजनिक करने को भी कहा।


इस एक्ट की आड़ में किस कदर जमीन का खेल हुआ, ये आष्चर्यजनक था। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और कश्मीर के राजसी परिवार के डॉ. कर्ण सिंह का जम्मू क्षेत्र के सतवाड़ी में 480 कनाल का कर्ण बाग था। रोशनी एक्ट की आड़ में इसे मोहम्मद रफीक नामक के पाकिस्तानी ने खरीद लिया और केवल मुसलमानों को ही इसमें से प्लॉट काट कर दे रहा था। यह बताने की जरूरत नहीं है कि यह सब इसलिए किया जा रहा था कि जम्मू क्षेत्र में बहुसंख्यक हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बनाने के लिए वहां बड़ी संख्या में मुस्लिमों को बसा दिया जाए। इस साजिश का खुलासा होने पर जम्मू के हितों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे वकील अंकुर शर्मा ने इसके खिलाफ बीड़ा उठा लिया। अंकुर शर्मा ने रोशनी एक्ट को हाईकोर्ट में चुनौती दी और उन्हीं की याचिका पर हाईकोर्ट ने पहले इस पर रोक लगाई और बाद में इसे रद्द कर दिया। इससे भी चैंकाने वाली बात यह है कि जम्मू के इस्लामीकरण की इस साजिश के तार विदेशों से भी जुड़े हुए हैं। कारगिल के 400 परिवारों ने जम्मू के नगरोटा के नज़दीक 105 कनाल ज़मीन खरीदी और इसके लिए पैसा सऊदी अरब से हवाला के जरिए आया। फारूक अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस सरकार में मंत्री रहे बशीर अहमद किचलू और विधायक चैधरी मोहम्मद हुसैन ने जम्मू में 500 से 800 कनाल जमीन खरीदी। सबसे पहली बात तो यह कि जो जमीन खरीदी गई, वह अधिकांश वन भूमि या आरक्षित भूमि थी, जिसे किसी को बेचा ही नहीं जा सकता, दूसरे लैंड सीलिंग के तहत एक तो कोई इतनी ज़मीन खरीद नहीं सकता और तीसरी बात - इतनी बड़ी जमीन की कीमत भी बहुत ज्यादा बैठती है। लेकिन इसके लिए विदेशी ताकतें फंडिंग कर रही थीं। जम्मू-कश्मीर में घाटी के मुसलमान ही मुख्यमंत्री पद पर काबिज रहे हैं और इसी कारण उनकी नीतियां भी कश्मीर के मुसलमानों के पक्ष में रही हैं। अनुच्छेद 370 की आड़ लेकर केंद्र सरकारें भी इससे पल्ला झाड़ती रहीं। आलम यह हो गया कि जम्मू क्षेत्र में भी अनेक ऐसी कॉलोनियां बन गईं, जहां केवल मुसलमान ही जमीन खरीद कर घर बना सकते हैं। सरकारी जमीन की बंदरबांट और जम्मू की डेमोग्राफी साजिशन बदलने का षड्यंत्र रचने वालों को न केवल कठोर दंड मिलना चाहिए, बल्कि उनकी तमाम जमीनें सरकार को अपने कब्जे में लेकर कुर्क कर देनी चाहिए, ताकि दोबारा कोई ऐसा दुःसाहस न कर पाए। साथ ही देश के हितों पर कुठारापात न हो पाए।